Thursday, August 19, 2010

दो ल्ब्ज़... (चार लाईना)

चिराग बेठा है रोशनी की आस मे,
बस कोई तो आ कर लौ जला दे...
 
दिवारें मौन है शाम की तन्हाई से,
बस कोई तो आ कर दो ल्ब्ज़ सुना दे...
 
योगेन्दु जोषी : १९/०८/२०१०.
 

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